वैशाख शुक्ल पक्ष एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है। मान्यता है की इस दिन भगवान विष्णु ने देवताओं को अमृत पान कराने के लिए विश्वमोहिनी रूप धारण किया था। कामना पूर्ति और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु की विधिपूर्वक पूजा अर्चना करते हैं। इस वर्ष इस शुभ तिथि के सन्दर्भ में स्थानानुसार पञ्चाङ्ग भेद के कारण किस दिन मनाई जाये इसमें मतभेद हैं। आइये आगे जानते हैं मोहिनी एकादशी (Mohini Ekadashi 2021) कब है, क्या है इसका माहात्म्य, पूजा विधि एवं कथा।
कब है मोहिनी एकादशी
इस वर्ष मोहिनी एकादशी स्थान और पञ्चाङ्ग भेद के कारण दो दिन पड़ रही है। वाराणसी आदि क्षेत्रों में जहाँ यह शनिवार 22 मई को होगी क्योंकि वहां उस दिन एकादशी तिथि सूर्योदय काल में होने के साथ समाप्त भी हो रही है तो दिल्ली आदि क्षेत्रों में रविवार 23 मई को होगी क्योंकि इस दिन ही यहाँ सूर्योदय काल में एकादशी तिथि रहेगी। अतः उचित होगा की आप अपने स्थानीय पञ्चाङ्ग के अनुसार व्रत के सही दिन का चुनाव करें।
मोहिनी एकादशी माहात्म्य
मोहिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से जातक मोहमाया के जाल और पाप से मुक्त हो जाता है तथा सब कष्ट और विपत्तियों से उसे छुटकारा मिलता है। इस व्रत के पालन और इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उसे सुख-समृद्धि तथा सफल दांपत्य जीवन की प्राप्ति होती है। जातक को भगवान विष्णु की अनन्य भक्ति प्राप्त होती है और उसके प्रभुत्व और व्यक्तित्व में वृद्धि होती है। ऐसी मान्यता है कि त्रेता युग में भगवती सीता के वियोग में दुखी भगवान श्रीराम ने इस व्रत को किया और बिछोह से मुक्ति पाई। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर युधिष्ठिर ने भी मोहिनी एकादशी का व्रत रखा और अपने कष्टों से मुक्ति पाई।
मोहिनी एकादशी पूजा विधि
मोहिनी एकादशी से एक दिन पहले व्रती को एकभुक्त सात्विक भोजन करना चाहिए। फिर एकादशी के दिन जातक प्रातः स्नानादि नित्यकर्म से निवृत्त होकर “ममाखिलपापक्षयपूर्वक श्रीपरमेश्वरप्रीतिकामनया मोहिनी एकादशीव्रतं करिष्ये” मंत्र से व्रत का संकल्प करे। तदुपरांत गरुड़ध्वज भगवान विष्णु की पूरी श्रद्धा और भक्ति से षोडशोपचार पूजन कर विष्णु सहस्रनाम का पाठ एवं मोहिनी एकादशी कथा का श्रवण करे। तत्पश्चात रात्रि में भगवन्नाम स्मरण करते हुए जागरण कर अगले दिन द्वादशी में व्रत का पारण करे।
मोहिनी एकादशी कथा
मोहिनी एकादशी की कथा के अनुसार प्राचीन काल में सरस्वती के तट पर एक भद्रावती नामक नगर था। वहां के राजा द्युतिमान के पांच पुत्र थे जिनमें से धृष्टबुद्धि नामक पुत्र कुसंगति में पड़कर वेश्यागमन आदि पतन के मार्ग पर चलने लगा। जब अपनी दुर्वृत्तियों की वजह से वह धन, धान्य, गृह, मान-सम्मान आदि से हीन हो गया तो वह चोरी, डकैती आदि हिंसावृत्ति में लग गया। उसकी इस दुर्गति से दयाद्र होकर कौण्डिन्य ने उसके उद्धार के लिए मोहिनी एकादशी व्रत करने को कहा। उनकी बात मानकर धृष्टबुद्धि ने मोहिनी एकादशी का व्रत किया जिसके प्रभाव से वह सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर स्वर्ग प्राप्त किया।


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